समाज में फैली बुराइयां
हमारे समाज में बहुत से बुराइयां हैं जब हम बाहर निकलते हैं तो देखते हैं कितने तरह की बुराई हो रही है पर आदमी चुपचाप है कोई गलत को गलत कहने वाला नहीं है सबको अपनी-अपनी पड़ी है प्रतिदिन बुराई बढ़ती जा रही है हमारी सभ्यता संस्कृति जो हमें विरासत में मिली है भूल रहे हैं हर आदमी को पैसे की भूख है सिर्फ और सिर्फ पैसे की भूख है पैसे के चक्कर में न जाने कौन कौन से पाप कर रहा है इतना भी अंधा होना क्या सही है कि आप सही को सही ना कर सके और गलत को गलत ना कर सके आखिर किस बात का डर है जो आप गलत हो गलत नहीं कह नहीं सकते उसके लिए 4 मिनट का टाइम आपके पास नहीं है अगर सभी व्यक्ति अपना-अपना देखने लगे और समाज में फैली बुराइयों पर ध्यान ना दें तो दिन पर दिन बढ़ते जाएंगे जो कि आज नहीं तो कल वह हमारे ऊपर भी आपके ऊपर भी प्रभाव डालेंगे